Wednesday, June 15, 2016

Vedanta Saara - Sadanand Yogindra Saraswati - Part 4


पूर्व में हमने देखा की साधन-चतुष्टय संपन्न प्रमाता/अधिकारी जब विधि के अनुसार गुरु के पास जाता है तब वह गुरु उसपर परम-कृपा करके अध्यारोप-अपवाद की प्रक्रिया से वेदान्त उपदेश देते हैं।

यह आकांक्षा-पद्धाति कहलाती है - भगवद्गीता में भी भगवान श्रीकृष्ण नें इस का प्रयोग किया है। एक वाक्य कहा जाता है और वह वाक्य शिष्य के मन में स्वाभाविक प्रश्न को जन्म देता है। इस प्रश्न के उत्तर में एक और वाक्य बोला जायेगा जिसमें पुनः कोई नया शब्द प्रतिपादित किया जायेगा। जिससे एक और प्रश्न का जन्म होगा। इस प्रकार यह प्रक्रिया चलती है। शिष्य के प्रश्न को आकांक्षा कहते हैं। पूर्व श्लोक में अध्यारोप अपवाद प्रतिपादित किया था। शिष्य के मन में यह प्रश्न आयेगा – अध्यारोप अपवादः कः?

वेदान्त विचार अध्यारोप-अपवाद प्रक्रिया से किया जाता है। अतः इस प्रक्रिया को स्पष्ट रूप से समझना आवश्यक है।

पहले 'अध्यारोप' की परिभाषा बताते हैं और उसके समस्त विस्तार को बताने के बाद श्लोक १३७ में 'अपवाद' की परिभाषा बतायेंगें।

अध्यारोप


असर्पभूतायां रज्जौ सर्पारोपवत् वस्तुनि अवस्तुः आरोपः – अध्यारोप॥३२॥

अन्वयः – असर्पभूतायाम् रज्जौ सर्प-आरोपवत् वस्तुनि अवस्तुः आरोपः अध्यारोपः।

अन्वयार्थः – (असर्पभूतायाम्) ऐसी रस्सी जिसका स्वरूप किसी भी काल में सर्प नहीं है, (रज्जौ) उस रस्सी में (सर्प-आरोपवत्) सर्प के आरोप के समान ही (वस्तुनि) ब्रह्म में (अवस्तुः) संसार/नानात्व/माया का (आरोपः) आरोप (अध्यारोपः) अध्यारोप/अध्यास कहलाता है।

Adhyaropa is the superimposition of the unreal on the real, like the false perception of a snake in a rope which is not a snake.

यहां रज्जु और सर्प के उदाहरण से अध्यारोप बोधित किया है । प्रमुख बिन्दु यह है कि एक पदार्थ पर उससे विपरीत पदार्थ का आरोपण किया जाता है और इसको की बल देने के लिये "असर्पभूतायां" का प्रयोग किया है । वस्तु (जो की अवस्तु नहीं है) में अवस्तु का आरोप होता है । हमेशा सत् के ऊपर असत् का आरोप होता है । 

यहां पर सदसत् कि जगह वस्तु और अवस्तु का प्रयोग इसलिये कर रहे हैं क्योंकि श्लोक १६ में नित्य को ‘वस्तु’ कहकर संबोधित किया था ।

शंकराचार्य अध्यास की परिभाषा देते हुये ब्रह्मसूत्र में कहते हैं - "स्मृतिरूपः परत्र पूर्वदृष्टावभासः" (ब्र० सू० प्रस्तावना) - स्मृति रूप से अन्यत्र पहले देखी हुई वस्तु का अवभास ही अध्यास है।

इससे आकांक्षा होती है कि – वस्तु क्या है और अवस्तु क्या है । उसका निरुपण आगे किया है। 

वस्तु सच्चिदाननदमद्वयं ब्रह्म अज्ञानादि सकल जड समूहोऽवस्तु॥३३॥

अन्वयः – वस्तु सत्-चित्-आनन्द-अद्वयम् ब्रह्म; अज्ञान-आदि-सकल जड-समूहः अवस्तु।


अन्वयार्थः – (वस्तु) वस्तु कहते हैं (सत्-चित्-आनन्द) सत् चित् आनन्द स्वरूप (अद्वयम्) अद्वितीय (ब्रह्म) ब्रह्म को; तथा (अज्ञान-आदि-सकल जड-समूहः) अज्ञान आदि जो भी सकल जड पदार्थ हैं वह सब (अवस्तु) अवस्तु कहलाते हैं।

Reality is Brahman which is without a second and is Existence, Consciousness, and Bliss. Unreality is Nescience and all other material objects.

तत्त्वबोध में इसी सन्दर्भ में आता है - सत् किम्? कालत्रयेऽपि तिष्ठतीति सत्। चित् किम्? ज्ञानस्वरूपः। आनन्दः कः? सुखस्वरूपः।
सत् वह है जिसकी प्रतीति तीनों कालों (भूत वर्तमान और भविष्य) में है। किसी अन्य साधन के बिना स्वयं प्रकाशमान होता हुआ जो अन्य सभी पदार्थों का प्रकाशक हो वह चित् है। सुखस्वरूप आनन्द है।

वेदान्त में ‘वस्तु’ का अर्थ केवल ‘ब्रह्मन्’ होता है । वसति अस्ति वा इति वस्तु और केवल ब्रह्मन् ही "है"  - नेह नानास्ति किञ्चन।

वस्तु के अलावा जो कुछ भी है वह अवस्तु है। अज्ञान आदि सकल जड़ समूह जो दिखता है यह सब अवस्तु है।सृष्टि में दो वस्तु (साधारण प्रयोग में) हैं – कार्यरूप और कारणरूप। प्रकृति कारणरुप है और यह सारा जगत रूप प्रपञ्च या सृष्टि कार्यरूप है। यह दोनों जड हैं। अन्तर केवल यह है कि प्रकृति अवक्त है और प्रपञ्च व्यक्त है। प्रकृति के स्थान पर अज्ञान शब्द का प्रयोग हुआ है। अज्ञान, अवस्तु, अविद्या, माया, प्रकृति, प्रपञ्च यह सब पर्यायवाची हैं।

जड वह है जो अपने आस्तित्व का बोध नहीं कर सकता अतः वह अचेतन है।

अब आकांक्षा होती है - कि अज्ञान क्या है? तो वह बताते हैं -


अज्ञानं तु – सदसद्भ्यामनिर्वचनीयं त्रिगुणात्मकं ज्ञानविरोधि भावरूपं यत् किञ्चिदिति वदन्ति अहमज्ञ इत्यादि अनुभवात् ‘देवात्मशक्तिं स्वगुणैः निगूढाम्’ (श्वेता. उ. १/३) इत्यादि श्रुतेश्च॥३४॥

अन्वयः – अज्ञानम् तु – सद् असद्भ्याम् अनिर्वचनीयम् त्रिगुणात्मकम् ज्ञानविरोधि भावरूपम् यत् किञ्चित् इति वदन्ति अहम् अज्ञः इत्यादि अनुभवात् ‘देवात्म-शक्तिं स्वगुणैः निगूढाम्’ (श्वेता. उ. १/३) इत्यादि श्रुतेः च।


अन्वयार्थः – (अज्ञानम् तु) किन्तु अज्ञानम् तो – (सद् असद्भ्याम्) सत् और असत् से भिन्न (अनिर्वचनीयम्) अनिर्वचनीय (त्रिगुणात्मकम्) तीन गुणों वाला, (ज्ञानविरोधि) ज्ञान का विरोधी, और (भावरूपम्) भावरूप है (यत् किञ्चित्) जो कोई भी या जब कोई (इति वदन्ति) ऐसा कहता है कि – (अहम् अज्ञः) “मैं नहीं जानता” (इत्यादि) इस प्रकार के वाक्यों से (अनुभवात्) अनुभव में आने वाला,  ‘(देवात्म-शक्तिं) दीप्तिमान् परमात्मा की शक्ति (स्वगुणैः) अपने ही गुणों से (निगूढाम्) छिपि हुई’ (इत्यादि) इस प्रकार की (श्रुतेः) श्रुतियों के द्वारा (च) भी जाना जाता है।

However, ignorance is described as something positive though intangible, which cannot be described either as being or non-being, which is made of three qualities and is antagonistic to Knowledge. Its existence is established from such experiences as “I am ignorant”, and from such Sruti passages as, “The power belonging to God Himself, hidden in its own qualities” (Svet. Up.I-3).

यहां पर अज्ञान को परिभाषित करते हैं। 
बुद्धि तभी समझ सकती है जब वस्तुओं (यहां 'वस्तु' शब्द का प्रयोग सामान्य बोलचाल भाषा वाला है) को उनके गुणों के अनुसार विभाजित करते हैं। Intellect can only understand things only when it is logically divided into different categories. It has to clearly divide things into different categories based on their properties and then analyze and understand it. We can see this in any field, biology has different categories - mammals, reptiles, cold-blodded warm-blodded plants, herbs shrubs, etc etc. Maths has random numbers, complex numbers, rational numbers etc. Chemistry has periodic table and everything is based on it. Astronomy has planets, stars, moons, black holes, galaxies etc.

अतः सृष्टि और ब्रह्म को समझाने के लिये अलग अलग दर्शनों में अलग अलग तरीके से विभाग किये गये हैं। अद्वैत वेदान्ती तीन विभाग करते हैं - 
  1. सत्
  2. असत्
  3. मिथ्या/अनिर्वचनीय/माया

पहले दो तो गीता में वर्णित है - 'नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः'। 

सत् वह है जिसका किसी भी काल में अभाव नहीं है जिसकी कभी भी अप्रतीति नहीं होती है जैसे - स्वयं का अनुभव। हमें अपने होने का अनुभव सदा रहता है।

असत् वह वस्तु है जिसका अनुभव या जिसकी प्रतीति कभी भी किसी भी काल में नही होती है जैसे गधे के सिर पर सींग। जो कभी भी नही था न है और न होगा। एक दूसरा प्रसिद्ध उदाहरण है वन्ध्यापुत्र - एक बांझ स्त्री का पुत्र।

अब यदि हम इस जगत का कोई उदाहरण लें जैसे हाथ की घड़ी - तो वह पहले नहीं थी (जब वह बनी थी उससे पहले वह नहीं थी) अभी वर्तमान में उसकी प्रतीति हो रही है, और वह भविष्य में नहीं होगी (यह हमारा अनुभव से अनुमान है कि वह कभी न कभी नष्ट होगी और उसके बाद उसकी प्रतीति नहीं होगी)। यह पूरा संसार इसके सब लोग सारे पदार्थ इस तरह ही हैं।
यह संसार सत् नहीं है क्योंकि इसके पदार्थ तीनों कालों में तो नहीं रहते हैं - सब कुछ कभी न कभी जन्मता या बनता है और कभी न कभी मृत्यु को प्राप्त होता है या नष्ट होता है। जिन वस्तुओं के बारे में अनुमान करने का सामर्थ्य हमारे भीतर नहीं है - जैसे यह पृथ्वी सूर्य चन्द्र अन्तरिक्ष आदि - उनके बारे में यह ज्ञान हमें शास्त्र से प्राप्त हो जाता है।
यह संसार असत् भी नहीं है क्योंकि इस संसार का अनुभव हमें वर्तमान में हो रहा है। हाथ की घड़ी भले भूत में न हो और भविष्य में न रहे पर वर्तमान में तो हमारी कलाई पर है। इसी प्रकार यह सारा जगत,लोग,पशु,पक्षी,वन,फूल आदि आदि सब वर्तमान में तो अनुभव में आ रहे हैं -  अतः यह असत् भी नहीं हैं।

हम यह भी नहीं कह सकते की यह सत् और असत् दोनों है क्योंकि कोई भी पदार्थ दोनों नहीं हो सकता।

इसी को अद्वैत वेदान्त में 'मिथ्या' या 'अनिर्वचनीय' कहते हैं, अनिर्वचनीय का अर्थ है - जिसके बारे में कुछ न कहा जा सके, जिसको परिभाषित न किया जा सके। अद्वैत वेदान्त का मिथ्या शब्द 'असत्' का पर्यायवाची नहीं है - जैसे की लोग समझते हैं - यह 'अनिर्वचनीय' का पर्यायवाची है। मिथ्या का अर्थ असत् नहीं है। मिथ्या का अर्थ है जिसकी प्रतीति अभी हो रही है पर वह नित्य नहीं है क्योंकि भूत और भविष्य में वह अप्रतीत है।

अतः अज्ञान/माया की परिभाषा है - "जिसको परिभाषित न किया जा सके"। जैसे किसी जादूगर का जादू हमको अनुभव में आता है हम उसे अपनी आंखों से देखते हैं पर उसके बारे में कुछ कह नहीं सकते की वह कैसे हुआ - यही अनिर्वचनीय है - और सबसे बड़ा जादूगर तो ईश्वर ही है - "मायावीव विजृम्भयत्यपि महायोगीव यः स्वेच्छया तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये।"

अनिर्वचनीय को एक दूसरे ढंग से - वेदान्त के सर्प रज्जु से समझा जा सकता है - एक कम रोशनी वाले कमरे में रस्सी को देखकर सर्प का भ्रम हो गया और उसके कारण डर लगा। फिर किसी नें आकर रोशनी कर के दिखा दिया कि यह तो रस्सी है और भय दूर हो गया। अतः जो भय उत्पन्न हुआ वह रस्सी के 'अज्ञान' के कारण हुआ और रस्सी का 'ज्ञान' होते ही दूर हो गया। 
अब यह अज्ञान 'ज्ञान' से बाधित हो गया। यदि यह अज्ञान सत् होता तो कभी नष्ट नहीं हो सकता था क्योंकि सत् तो कभी नष्ट नहीं होता। यह अज्ञान असत् भी नहीं था क्योंकि यह था और उसके कारण भय भी उत्पन्न हुआ क्योंकि कोई वस्तु तो है ही नहीं वह कुछ प्रभाव नहीं डाल सकती - अतः कुछ तो था - और वह ज्ञान से नष्ट भी हो गया - इस को ही अनिर्वचनीय कहते हैं। यदि वह अज्ञान सत् होता तो कभी नष्ट नहीं होता और यदि असत् होता तो भय उत्पन्न नहीं करता और उसको नष्ट करने की आवश्यकता ही नहीं होती - अतः अनिर्वचनीय।

यह अज्ञान तीन गुणों से युक्त है - सत्त्व रजस् और तमस्।

इसलिये इसको ज्ञान विरोधी कहते हैं क्योंकि यह ज्ञान को सहन नहीं कर सकता यह ज्ञान से नष्ट हो जाता है बाधित हो जाता है।
यह 'अज्ञान' है और यह ज्ञान से बाधित भी हो जाता है इसलिये यह 'भावरूप' है। यदि यह अभावरूप होता तो कोई प्रयास करने की आवश्यकता ही नहीं होती क्योंकि जो है ही नहीं उसका नाश क्या करना।

अतः यह अज्ञान ज्ञान-विरोधी है और भावरूपं है अर्थात यह ‘है’ और नाशवान है। इस अज्ञान का इतना सामर्थ्य है कि यह सकल प्रपञ्च उत्पन्न कर सकता है परन्तु इतना सामर्थ्यवान नहीं है कि यह सदा विद्यमान रह सके (सत् नहीं है)।

अब यह प्रश्न आता है कि इसका प्रमाण क्या है कि यह कुछ काल तक भावरूपं है। तो यहां पर दो प्रमाण दिये गये हैं – एक है स्व-अनुभव और दूसरा है श्रुति-
  1. व्यक्ति से अपने अनुभव से इसकी सत्ता प्रमाणित होती है - जैसे यदि किसी ऐसे व्यक्ति से (जिसको Russian भाषा नहीं आती है) पूछो कि - "क्या आपको Russian आती है?" तो वह कहेगा नहीं आती है। अतः उसको इस अज्ञान का अनुभव हो रहा है। यदि यह अज्ञान भावरूप न होता तो इसका अनुभव नहीं हो सकता था क्योंकि जो है ही नहीं उसका अनुभव कैसे हो सकता है। परन्तु व्यक्ति हो यह अनुभव होता है कि उसमें अज्ञान कै अतः यह भावरूप है। अतः साक्षी का अनुभव ही अज्ञान का प्रमाण है।
  2. देवात्मा (परब्रह्म) की शक्ति है यह मूल-अज्ञान/प्रकृति और यह अपने ही गुणों से (सत् रजस् तमस्) से छिपी हुई है – ऐसा श्वेता० उपनिषद श्रुति कहती है।


अव्यक्तनाम्नी परमेशशक्तिः अनादि अविद्या त्रिगुणात्मिका परा ।
कार्यानुमेया सुधियैव माया यया जगत्सर्वमिदं प्रसूयते ॥विवेक चूडामणि ११०॥

- यह परमेश्वर की शक्ति है, यह परा, त्रिगुणात्मिका, अनादि है। 'अव्यक्त' 'माया' 'अविद्या' आदि इसके नाम हैं। यह बुद्धिमान मनुष्यों के द्वारा अपने कार्य से (अनुमान से) जानी जाति है। इसने ही यह सारा जगत उत्पन्न किया है।
यह माया कारण रूप में अव्यक्त है और इस कार्यरूप सारे जगत को व्यक्त करती है। Matter can never be created nor can it be destroyed, it only converts from one form to another. All the Scientists in the world together cannot create even an ounce of matter. When matter is (looks like) destroyed it only converts to more subtler and unmanifest form. इस सृष्टि की, सूक्ष्मस्थूलशरीरों की कभी रचना नहीं होती यह अव्यक्त होते हैं और फिर व्यक्त हो जाते हैं फिर अव्यक्त होते हैं और फिर व्यक्त और यही सृष्टि क्रम चलता रहता है।

भगवद्गीता से कुछ श्लोक -
अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत । अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना॥2.28॥
अव्यक्ताद्व्यक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे। रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसंज्ञके॥8.18॥
भूतग्रामः स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते। रात्र्यागमेऽवशः पार्थ प्रभवत्यहरागमे॥8.19॥
परस्तस्मात्तु भावोऽन्योऽव्यक्तोऽव्यक्तात्सनातनः। यः स सर्वेषु भूतेषु नश्यत्सु न विनश्यति॥8.20॥

सन्नाप्यसन्नप्युभयात्मिका नो भिन्नाप्यभिन्नाप्युभयात्मिका नो। 
सङ्गाप्यनङ्गाप्युभयात्मिका नो महाद्भुतानिर्वचनीयारूपा॥ विवेक चूडामणि १११॥

न यह सत् है न असत् है और न यह दोनों ही है। न यह ब्रह्म से भिन्न है न हि अभिन्न है और न यह दोनों ही है। न यह अंगसहित है और न यह अंगरहित है और न यह दोनों ही है। यह माया अन्यन्त अद्भुत् और अनिर्वचनीयरूपा है।

शुद्धाद्वयब्रह्मविबोधनाश्या सर्पभ्रमो रज्जुविवेकतो यथा। 
रजस्तमः सत्त्वमिति प्रसिद्धा गुणास्तदीयाः प्रथितैः स्वकार्यैः ॥विवेक चूडामणि ११२॥

रज्जु के ज्ञानसे सर्प भ्रम के समान वह अद्वितीय शुद्ध ब्रह्मके ज्ञानसे ही नष्ट होनेवाली है। अपने-अपने प्रसिद्ध कार्योंके कारण सत्त्व, रज और तम - ये उसके तीन गुण प्रसिद्ध हैं।



ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
हरिः ॐ

Note:
The English commentary/translation is by Swami Nikhilanand (published by Advaita Ashrama).

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