Friday, May 6, 2016

Vedanta Saara - Sadanand Yogindra Saraswati - Part 3

पूर्व श्लोकों में बताया था कि अधिकारी वह है

  • जिसको विधिवत वेद-वेदांगों का अध्ययन करने के द्वारा समस्त वेदार्थ प्राप्त हो गया है इस जन्म में अन्यथा किसी और जन्म में। 
  • जिसनें काम्य और निषिद्ध कर्मों का त्याग कर दिया है और फिर नित्य नैमित्तिक प्रायश्चित्त तथा उपासना कर्मों के अनुष्ठान के द्वारा समस्त पापों और मलिनता का नाश कर अन्तःकरण को अत्यन्त निर्मल कर लिया है। 
इस प्रकार के अनुष्ठान से व्यक्ति साधन चतुष्टय सम्पन्न अधिकारी होता जाता है वह ही यथार्थ ज्ञान को ग्रहण करने के लिये योग्य प्रमाता है। अतः नित्य नैमित्तिक और उपासना कर्मों के द्वारा चित्त तैयार हो जाता है और साधक चतुष्टय साधनों से समपन्न हो जाता है।
अब यहां साधन चतुष्टय की चर्चा प्रारम्भ करते हैं -

साधन चतुष्टय


साधनानि- नित्यानित्यवस्तुविवेकेहामुत्रार्थफलभोगविराग-शमादिषट्कसम्पत्तिमुमुक्षुत्वानि ॥१५॥

अन्वयः – साधनानि – नित्य-अनित्य-वस्तु विवेक, इह अमुत्र अर्थ-फल-भोग-विराग, शम-आदि-षट्क-सम्पत्ति-मुमुक्षुत्वानि।

अन्वयार्थः – (साधनानि) वह ४ साधन हैं – (नित्य-अनित्य-वस्तु विवेक) नित्य और अनित्य वस्तु का विवेक, (इह) यहां इस लोक में, और (अमुत्र) परलोकों में (अर्थ-फल-भोग-विराग) कर्म के फल रूपी प्राप्त भोगों से वैराग्य, (शम-आदि-षट्क-सम्पत्ति) शम आदि छः सम्पत्तियाँ तथा (मुमुक्षुत्वानि) मुमुक्षुत्व।

The means to the attainment of Knowledge are: discrimination between things permanent and transient; renunciation of the enjoyment of the fruits of actions in this world and hereafter; six treasures, such as control of the mind etc., and the desire for spiritual freedom.

इनका विस्तार आगे के श्लोकों में करते हैं -

नित्यानित्यवस्तुविवेकस्तावद् ब्रह्मैव नित्यं वस्तु ततोऽन्यदखिलमनित्यमिति विवेचनम् ॥१६॥

अन्वयः – नित्य-अनित्य-वस्तु-विवेकः तावद् ब्रह्म एव नित्यं वस्तु ततः अन्यद् अखिलम् अनित्यम् इति विवेचनम्॥

अन्वयार्थः – (नित्य-अनित्य-वस्तु-विवेकः) नित्यानित्यवस्तुविवेक इस शब्द का (तावद्) अर्थ हुआ (ब्रह्मैव) एकमात्र ब्रह्म ही (नित्यं वस्तु) नित्य वस्तु है और (ततः) उसके (अन्यद्) अतिरिक्त (अखिलम्) सब कुछ (अनित्यम्) अनित्य है (इति) इस प्रकार का (विवेचनम्) विवेचन करना।

Discrimination between things permanent and transient; this consists of the discrimination that “Brahman alone is the permanent Substance and that all things other than It are transient.”

विवेक शब्द बना है – “विजिर् पृथग्भावे” धातु से जिसका अर्थ होता है – अलग भाव (होना)। विवेक शब्द का अर्थ होता है अलग करना। इस प्रकार बुद्धि से अलग करने को विवेचन करना कहते हैं। अपने लिये अच्छे बुरे का विवेक करना, एक वस्तु से अन्य वस्तु को अलग करना इस प्रकार का विवेक सामान्यतः सबके अन्दर होता है परन्तु यहां साधनों में एक विशेष प्रकार का विवेक अपेक्षित होता है और वह है – नित्य और अनित्य वस्तु का विवेक। नित्य वह है जिसका किसी भी काल में अभाव नहीं है - – नाभावो विद्यते सतः, जो तीनों भूत भविष्य और वर्तमान तीनों काल में विद्यमान है – त्रिकालेऽपि यत् तिष्ठति । एकमात्र ब्रह्म ही सदा विद्यमान नित्य वस्तु है। इसके विपरीत जो कुछ भी है वह अनित्य और असत् है – नासतो विद्यते भावः। विवेक पहला साधन है और उसी के फलस्वरूप अनित्य और असत् जगत् से वैराग्य उत्पन्न होता है।

ऐहिकानां स्रक्चन्दनवनितादिविषयभोगानां कर्मजन्यतयानित्यत्ववद् आमुष्मिकाणामप्यमृतादिविषयभोगानामनित्यतया तेभ्यो नितरां विरतिः इहामुत्रार्थफलभोगविरागः॥१७॥

अन्वयः – एहिकानाम् स्रक्-चन्दन-वनिता-आदि-विषय-भोगानाम् कर्मजन्यतया-अनित्यत्ववत् आमुष्मिकाणाम् अपि अमृत-आदि-विषय-भोगानाम् अनित्यतया तेभ्यो नितराम् विरतिः – इह-अमुत्र-फलभोग-विरागः।

अन्वयार्थः – (एहिकानाम्) इस लोक में (स्रक्) फूलों की माला (चन्दन) चन्दन (वनिता) स्त्री (आदि) आदि जो (विषय-भोगानाम्) विषय भोग हैं वह (कर्मजन्यतया) कर्मजन्य होने के कारण (अनित्यत्ववत्) अनित्य है, इसी प्रकार (आमुष्मिकाणाम्) परलोक से संबंध रखने वाले (अपि) भी (अमृत-आदि) देवत्व आदि स्वर्गलोक और अन्य लोकों के (विषय-भोगानाम्) विषय भोग भी (अनित्यतया) अनित्य हैं, एसा जानकर (तेभ्यो) इन दोनों के प्रति (नितराम्) नितान्त (विरतिः) वैराग्य होना, (इह-अमुत्र-फलभोग-विरागः) इहामुत्रफलभोगविरागः इस शब्द का अर्थ है।

The objects of enjoyment hereafter, such as immortality etc., being as transitory as the enjoyment of such earthly objects as a garland of flowers, sandal paste and sex-pleasures, which are transitory, being results of action – an utter disregard for all of them is renunciation of the enjoyment of fruits of action in this world and hereafter.

माला से अर्थ है प्राप्त होने वाला सम्मान पद प्रतिष्ठा आदि। चन्दन से अर्थ है जो शारीरिक सुन्दरता और अपने को सवांरने का भाव आदि है और नारी से तात्पर्य है कि विषय भोग। इस प्रकार एक एक शब्द से पूरा समूह समझना चाहिये। जो भी कर्मजनित फल होते हैं वह क्षणिक और अनित्य होते हैं। जिस प्रकार इस लोक में हमार प्रत्यक्ष अनुभव है कि सभी कुछ क्षणभंगुर है इसी प्रकार हमारे कर्मों से परलौकिक सुख उत्पन्न होंगे वह भी अनित्य ही होंगे। स्वर्गलोक की अमरता भी सापेक्ष है। वह पुण्य कर्मों के फलस्वरूप प्राप्त होती है उसके क्षीण हो जाने पर समाप्त हो जाती। 
इसके श्रुति और स्मृति प्रमाण भी हैं –
“तद् यथेह कर्मजितो लोकः क्षीयते एवमेव अमुत्र पुण्यजितो लोकः क्षीयते।“ (छान्दोग्योपनिषद् ८-१-६)।
“ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोकमश्नन्ति दिव्यान्दिवि देवभोगान्। ते तं भुत्क्वा स्वर्गलोक विशालं क्षीणेो पुण्ये मत्र्यलोक विशान्ति॥“ (गीता ९-२१)।

ऐसे अनित्य सुख भोगों में अनन्त दुःख ही है। ऐसे समझकर उनसे वैराग्य होता है।

शमादयस्तु - शमदमोपरतितितिक्षासमाधान –श्रद्धाख्याः॥१८॥

अन्वयः – शमादयः तु – शम-दम-उपरति-तितिक्षा-समाधान-श्रद्धा-आख्याः।

अन्वयार्थः – (शमादयः तु) शमादि षट्क सम्पत्ति का – शम-दम-उपरति-तितिक्षा-समाधान-श्रद्धा (आख्याः) इस प्रकार व्याख्यान करते हैं।

Sama etc., comprise Sama or the restraining of the outgoing mental propensities, Dama or the restraining of the external sense-organs, Uparati or the withdrawing of the Self, Titiksha or forbearance, Samadhana or self-settledness, and Sraddha or faith.

वैराग्य के फलस्वरूप इन सम्पत्तियों की वृद्धि होती है - इनका विवरण आगे देते हैं –

शमस्तावत् - श्रवणादिव्यतिरिक्तविषयेभ्यो मनसो निग्रहः॥१९॥

अन्वयः – शमः तावत् – श्रवणादि-व्यतिरिक्त-विषयेभ्यः मनसः निग्रहः।

अन्वयार्थः – (शमः) शम (तावत्) होता है – (श्रवणादि) शास्त्र के श्रवन मनन और निदिध्यासन (व्यतिरिक्त) के अतिरिक्त (विषयेभ्यः) अन्य समस्त विषयों से (मनसः) मन का (निग्रहः) निग्रह करना हटा लेना।

Sama is the curbing of the mind from all objects except hearing etc.,

शब्दस्पर्शादि जो इन्द्रियों के विषय हैं उनमे मन की रुचि न होना शम कहलाता है। किन्तु तत्त्वज्ञान के साधन - श्रवण-मनन-निदिध्यासन में रुचि अवश्य होनी चाहिये।

तत्त्वबोध – शमः कः? अन्तरिन्द्रियनिग्रहः।

दमः - बाह्येन्द्रियाणां तद्व्यतिरिक्तविषयेभ्यो निवर्तनम्॥२०॥

अन्वयः – दमः बाह्य-इन्द्रियाणाम् तद् व्यतिरिक्त-विषयेभ्यो निवर्तनम्।
अन्वयार्थः – (दमः) दम कहते हैं (बाह्य-इन्द्रियाणाम्) ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रिय इत्यादि बाह्य इन्द्रियों का (तद् व्यतिरिक्त) उन श्रवण-मनन-निदिध्यासन के अतिरिक्त – यहां ‘तद्’ से पूर्व श्लोक में तात्पर्य है- (विषयेभ्यो) अपने अपने विषयों से (निवर्तनम्) निग्रह करना।

Dama is the restraining of the external organs from all objects except that.

ज्ञान का साधन तो श्रवणादि इन्द्रियां ही हैं उन्ही से हम गुरु के उपदेश का श्रवण करते हैं। अतः श्रवण मनन और निदिध्यासन तो करने ही चाहिये क्योंकि यही मोक्षप्राप्ति के साधन हैं परन्तु इनके अतिरिक्त अन्य विषयों से इन्द्रियों को हटा लेना चाहिये। यदि इन्द्रियाँ और मन विषयों के भोग में लगे रहे तो यह ज्ञान प्राप्ति में बाधक होगा।

तत्त्वबोध –दमः कः? बाह्येन्द्रियनिग्रह।

निवर्तितानामेतेषां तद्व्यतिरिक्तविषयेभ्य उपरमणमुपरतिरथवा विहितानां कर्मणां विधिना परित्यागः॥२१॥

अन्वयः – निवर्तितानाम् एतेषां तद् व्यतिरिक्त-विषयेभ्यः उपरमणम् उपरतिः अथवा विहितानाम् कर्मणाम् विधिना परित्यागः।

अन्वयार्थः – (निवर्तितानाम्) विषयों से हटाई हुई (एतेषां) इन मन और इन्द्रियों का (तद्) श्रवण-मनन-निदिध्यासन से (व्यतिरिक्त-विषयेभ्यः) अतिरिक्त सभी विषयों से (उपरमणम्) विरक्ति (अथवा) और दूसरी परिभाषा के अनुसार (विहितानाम्) नित्य-नैमित्तिक आदि (कर्मणाम्) कर्मों को (विधिना) शास्त्रोक्त विधि के द्वारा (परित्यागः) परित्याग करना।

Uparati is the cessation of these external organs so restrained, from the pursuit of objects other than that; or it may mean the abandonment of the prescribed works according to scriptural injunctions.

उपरति और शम-दम में सूक्ष्म अन्तर है। शम-दम का अर्थ है विषयों से मन और इन्द्रियों को हटाना और उपरति का अर्थ है उस अवस्था को स्थिर रखना क्योंकि मन और इन्द्रियां पुनः अपने विषयों मे जाने का प्रयास करेंगी। दूसरी परिभाषा है विविदिषा सन्यास लेना क्योंकि शास्त्रों के अनुसार केवल विधिवत् सन्यास ग्रहण करके की नित्य और नैमित्तिक कर्मों का त्याग किया जा सकता है। यदि ग्रहस्थाश्रम में व्यक्ति को मोक्ष प्राप्त हो भी जाता है और उसका कर्मों में कोई प्रयोजन नहीं रह जाता है फिर भी वह नित्य-नैमित्तिक कर्मों का परित्याग नहीं कर सकता। भगवान राम और भगवान कृष्ण का जीवन इसका उदाहरण है।

तितिक्षा - शीतोष्णादिद्वन्द्वसहिष्णुता॥२२॥

अन्वयः - तितिक्षा - शीत-ऊष्ण-आदि-द्वन्द्व-सहिष्णुता।

अन्वयार्थः - (तितिक्षा) तितिक्षा कहते हैं  (शीत-ऊष्ण-आदि-द्वन्द्व-सहिष्णुता) शीत ऊष्ण आदि द्वन्द्वों को सहन करना।

Titiksha is the endurance of heat and cold and other pairs of opposites.

सर्दी गर्मी के अतिरिक्त मान-अपमान जय-पराजय लाभ-हानि आदि जो भी द्वन्द्व हैं उनको सहन करना। 

इसमें मुख्य बात यह है कि बिना दुःख और शोक के सहन करता है। जैसा विवेक-चूडामणि में बताया है -

सहनं सर्वदुःखानामप्रतीकारपूर्वकम्। चिन्ताविलापरहितं सा तितिक्षा निगद्यते॥

चिन्ता और शोक से रहित होकर बिना कोई प्रतिकार किये सब प्रकार के कष्टोंका सहन करना तितिक्षा कहलाती है।

निगृहीतस्य मनसः श्रवणादौ तदनुगुणविषये च समाधिः - समाधानम्॥२३॥

अन्वयः – निगृहीतस्य मनसः श्रवणादौ तद् अनुगुण-विषये च समाधिः – समाधानम्।

अन्वयार्थः – (निगृहीतस्य) निग्रहित किये हुये (मनसः) मन को (श्रवणादौ) श्रवण-मनन-निदिध्यासन में, तथा (तद्) इनके (अनुगुण) सहायक (विषये) विषयों में (समाधिः) स्थिर रखना, कहते है – समाधानम्।

Samadhana is the constant concentration of the mind, thus restrained, on hearing etc., of the scriptural passages and other objects that are conducive to these.

तद् अनुगुण विषये – और कोई जो सहायक हो इन तीनों का जैसे वैराग्य, अमानित्व आदि विषय, तर्क मींमांसा व्याकरण आदि।शम और दम से मन को व्यर्थ की वस्तुओं से हटाया गया है। उपरति से उनको उस मनःस्थिति को स्थिर रखा गया है।
जैसे धन का व्यर्थ न व्यय करना शम और दम हैं और उसको bank में जमा करके रखना उपरति है। परन्तु यह जमा पूंजी को सही समय पर खर्च रखने के लिये हि रखा है। सही समय पर उसको खर्च करना समाधान है।
हम भी इसी प्रकार अपनी शक्ति और सामर्थ्य को व्यर्थ के विषयों में नष्ट कर रहे हैं। उन व्यर्थ के विषयों से अपने मन और इन्द्रियों को हटाना है – इसका नाम शम और दम है। फिर इनको वापस विषयों में जाने नहीं देना है – यह उपरति हो गई। अब हमारे पार मानसिक शक्ति और सामर्थ्य है अब इस सामर्थ्य को प्रयोग मोक्ष प्राप्ति के साधन में करना है। वह साधन है गुरु उपदिष्ट वेदान्त वाक्यों का श्रवण मनन और निदिध्यासन और इसमें ही मन को स्थिर रखना समाधान है। समाधि का अर्थ होता है स्थिर रखना या एकाग्र करना।

गुरूपदिष्टवेदान्तवाक्येषु विश्वासः - श्रद्धा॥२४॥

अन्वयः – गुरु-उपदिष्ट-वेदान्त-वाक्येषु विश्वासः – श्रद्धा।

अन्वयार्थः - (गुरु उपदिष्ट) गुरु के द्वारा उपदेश किये हुए (वेदान्त-वाक्येषु) वेदान्त के वाक्यों में (विश्वासः) विश्वास करना – श्रद्धा कहलाता है।

Sraddha is the faith in the truths of Vedanta as taught by the Guru.

अब यह समझा जा सकता है कि यह अन्धविश्वास या blind belief होगी क्या? प्रश्न यह उठता है कि यदि शास्त्र कुछ तर्क-असंगत (illogical) कहता है तो क्या उसको आंख बन्द करके मान लेना चाहिये? यदि नहीं मानते हैं और वेदान्त वाक्यों पर प्रश्नचिह्न उठाते हैं तो अश्रद्धा हुई और यदि मानते हैं तो अन्धविश्वास हुआ? 
वास्तव में हमें वेदान्त वाक्यों पे नहीं अपितु अपनी समझ पर प्रश्नचिह्न उठाना चाहिये। शास्त्रवाक्यों में कुछ भी तर्क-असंगत/illogical नहीं है यदि हमें लगता है कि वह illogical हैं तो यह इसलिये हैं क्योंकि हमारी समझ ठीक नहीं है। हमारी समझ illogical है न कि शास्त्रवाक्य। इसके समाधान के लिये हमें गुरुजनों से बार बार तब तक प्रश्न करना चाहिये जब तक की हमारी बुद्धि उसको ठीक से समझ न जाये और वह हमको तर्कसंगत/logical न लगने लगे। 
इसका सबसे उत्तम उदाहरण भगवद्गीता है जिसमें अर्जुन श्रीकृष्णसे अनेक प्रश्न करता है – ‘व्यामिश्रेणेव वाक्येन बुद्धिं मोहयसीव मे’ – अर्जुन कहता कि आपके वाक्यों से मेरी बुद्धि मोहित हो रही है इसलिये कृपया पुनः बतायें। यहीं शंका समाधान का सूत्र है – तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया।

मुमुक्षुत्वम् - मोक्षेच्छा॥२५॥

अन्वयः – मुमुक्षुत्वम् – मोक्ष-इच्छा।

अन्वयार्थः – (मुमुक्षुत्वम्) मुमुक्षुत्व कहते हैं – मोक्ष-इच्छा को।

Mumukshutva is the yearning for spiritual freedom.

एवम्भूतः प्रमाताधिकारी "शान्तो दान्तः" (बृ उ ४।४।२३) इत्यादिश्रुतेः । उक्तञ्च – "प्रशान्तचित्ताय जितेन्द्रियाय च प्रहीणदोषाय यथोक्तकारिणे। गुणान्वितायानुगताय सर्वदा प्रदेयमेतत् सकलं मुमुक्षवे" (उपदेशसाहस्री ३२४।१६।७२) ॥२६॥

अन्वयः – एवम् भूतः प्रमाता अधिकारी ‘शान्तो दान्तः’ इत्यादि श्रुतेः। उक्तम् च – ‘प्रशान्त-चित्ताय जितेन्द्रियाय च प्रहीण-दोषाय यथोक्त-कारिणे। गुणान् विताय अनुगताय सर्वदा प्रदेयम् एतत् सकलम् मुमुक्षवे॥‘ इति।

अन्वयार्थः – (एवम् भूतः) इस प्रकार साधन चतुष्टय से सम्पन्न (प्रमाता) जिज्ञासु को (अधिकारी) वेदान्त का अधिकारी कहते हैं, जैसा कि ‘(शान्तो दान्तः)’ ‘जिसका मन तथा इन्द्रियां संयमित हैं’ (इत्यादि श्रुतेः) इत्यादि श्रुतियों में कहा है। (उक्तम् च) साथ ही यह भी कहा गया है – ‘(प्रशान्त-चित्ताय)  प्रशान्त चित्तः यस्य सः - जिसका चित्त शान्त है अर्थात जिसमें शम है, (जितेन्द्रियाय) जितानि इन्द्रियाणि येन सः तस्मै – जिसकी इन्द्रियां उसके वश में हैं अर्थात दम से सम्पन्न (च) और (प्रहीण-दोषाय) प्रहीणाः दोषाः येन सः जिसके दोष क्षीण हो चुके हैं अर्थात जिसके राग-द्वेष आदि क्षीण हो चुके हैं, जिसमें वैराग्य आ चुका है (यथोक्त-कारिणे) शास्त्रेण यथा उक्तं तथा करोति इति यथोक्तकारी – जैसा की शास्त्रों में नित्य और नैमित्तिक कर्मादि उपदिष्ट हैं उनका उस प्रकार से अनुष्ठान करने वाला – जो आज्ञाकारी और विनम्र है। (गुणान् विताय) जिसमें शास्त्रों के द्वारा वर्णित गुण हैं जैसे अमानित्व, उपरति, विवेक, समाधान आदि (अनुगताय सर्वदा) जो सर्वदा अपने गुरु का अनुसरण करता है और उनकी सेवा करता है और श्रद्धावान है (प्रदेयम्) प्रदान करना चाहिये (एतत्) ज्ञान को (सकलम्) संपूर्णतया (मुमुक्षवे) मुमुक्षु को॥‘ इति।


Such an aspirant is a qualified student; for it is said in the sruti passages, “quiet, subdued” (Br. Up. IV-4.23). It is further said, “This is always to be taught to one who is of tranquil mind, who has subjugated his senses, who is free from faults, obedient, endowed with virtues, always submissive, and who is constantly eager for liberation” (Sankara’s Upadesha-Sahasri 324.16.72)

यहां पर प्रमाण दिया गया है। यह चर्चा अन्य ग्रन्थों में भी हुई है और श्रुति के प्रमाण भी हैं।
उपदेशसाहस्री के श्लोक में मुख वाक्य है – (एतत्) यह ज्ञान (सकलम्) संपूर्णतया (मुमुक्षवे) मुमुक्षु को (प्रदेयम) प्रदान करना चाहिये। बाकी सारे उस मुमुक्षु के विशेषण हैं। कई जगह पाठभेद में ‘सकलं’ के स्थान पर ‘सततम्’ भी होता है जिसका अर्थ होगा सर्वदा देना चाहिये।
इस प्रकार अधिकारी के लक्षण कहे गये। यहां पर न केवल यह बताया है कि अधिकारी के लक्षण क्या हैं अपितु यह भी बताया है कि अधिकारित्व कैसे प्राप्त करना है – काम्य निषिद्ध कर्म वर्जन पुरःसरं, नित्य नैमित्तिक उपासना अनुष्ठानम् एव अधिकारित्व साधनं। नित्यनैमित्तिक अनुष्ठानम् चित्त शुद्धिं जनयति उपासना कर्म अनुष्ठानं चित्त नैश्चैल्यं च जनयति। चित्तशुद्धिः चित्तनैश्चल्यञ्च साधन-चतुष्टयमिति उच्यते। नित्यनैमित्तिक अनुष्ठान से चित्त शुद्धि प्राप्त होती है और उपासना से चित्त एकाग्र होता और है और इस को ही साधन-चतुष्टय सम्पन्न चित्त कहते हैं।

विषयः - जीवब्रह्मैक्यं शुद्धचैतन्यं प्रमेयं तत्र एव वेदान्तानां तात्पर्यात्॥२७॥

अन्वयः – विषयः जीव-ब्रह्म-ऐक्यम् शुद्ध-चैतन्यम् प्रमेयम् तत्र एव वेदान्तानाम् तात्पर्यात्।

अन्वयार्थः – (विषयः) ग्रन्थ का विषय है (जीव-ब्रह्म-ऐक्यम्) जीव और ब्रह्म दोनों एक ही अखण्ड (शुद्ध-चैतन्यम्) शुद्ध चैतन्य हैं (प्रमेयम्) यह ही जानने योग्य अथवा अज्ञात है। और यही विषय इसलिये हैं क्योंकि (तत्र एव) यहां ही (वेदान्तानाम्) वेदान्त ही (तात्पर्यात्) तात्पर्य होने के कारण।

The subject is the identity of the individual self and Brahman, which is of the nature of Pure intelligence and is to be realised. For such is the purport of the Vedanta texts.

विषय है जीव और ब्रह्म का ऐक्यं। यहां ऐक्यं का अर्थ योग या मिलना या union/merger आदि नहीं है क्योंकि मिलना तो उसका होता है जो अलग हों। यहां ऐक्य से तात्पर्य है कि जीव और ब्रह्म दोनों ही अखण्ड एकरस शुद्ध चैतन्य हैं। जीव और ब्रह्म दो वस्तु नहीं हैं यह एक ही वस्तु के दो नाम हैं। 
प्रमेय उसको कहते हैं जो अज्ञात हो, जिसको जानना हो, जो प्रमाण का विषय हो।
वेदान्त में तो कई विषय की चर्चा है जैसे अन्नमय कोश सृष्टि प्रकरण आदि आदि फिर यह कैसे कहा कि वेदान्त का यही तात्पर्य है? उपक्रम आदि ६ लिङ्गों से हम वेदान्त का तात्पर्य निश्चित करते हैं। इनक विवरण इस ग्रन्थ के अन्तिम भाग में दिया जायेगा।

अब तक हमको यह भी पता चल गया है –
  • प्रमाता - अधिकारी
  • प्रमेयं - जीवब्रह्मैक्यं
  • प्रमाण – वेदान्त (गुरु उपदिष्ट)
जब यह तीनों साथ आते हैं तो प्रमा – यर्थाथ (ब्रह्म) ज्ञान की उत्पत्ति होती है। इनमें से यदि कोई भी कम है तो ज्ञान उत्पन्न नहीं होगा।

सम्बन्धस्तु - तदैक्यप्रमेयस्य तत्प्रतिपादकोपनिषत्प्रमाणस्य च बोध्यबोधकभावः॥२८॥

अन्वयः - तद् ऐक्य-प्रमेयस्य तत्-प्रतिपादक-उपनिषत्-प्रमाणस्य च बोध्य-बोधक-भावः।

अन्वयार्थः – (तद्) वह जो जीव-ब्रह्म में (ऐक्य) ऐक्य है और जो (प्रमेयस्य) प्रमेय है उसका और (तत्) इस ऐक्य का (प्रतिपादक) प्रतिपादन करने वाले (उपनिषत्-प्रमाणस्य) उपनिषद प्रमाण का (बोध्य-बोधक-भावः) बोध्य बोधक भाव है।

The connection is the relation between that identity which is to be realised and the evidence of the Upanishads that establishes it, as between a thing to be known and that which tells of it.

सम्बन्ध किसी दो सम्बन्धी/वस्तु के मध्य में होता है। यह संबन्ध अन्य अन्य पुस्तकों में अलग होता है क्योंकि वह कई बार अलग अलग वस्तुओं का चुनाव करते हैं। जैसे यदि हम ‘ज्ञान’ और ‘प्रयोजन’ लें तो – ज्ञान और मोक्ष (जो कि प्रयोजन) है के मध्य में – जनक-जन्य सम्बन्ध है क्योंकि ज्ञान मोक्ष को उत्पन्न करता है। ज्ञान जनक है जो कि मोक्ष को उत्पन्न करता है। 
इसी प्रकार यदि ‘उपनिषद् ग्रन्थ’ और ‘विषय’ (जीवब्रह्मैक्यं) लें तो उनमें बोध्य-बोधक या फिर प्रतिपाद्य-प्रतिपादक संबंध होता है क्योंकि उपनिषद जिस विषय का प्रतिपादन करते हैं वह जीवब्रह्मैक्यं है। यह सम्बन्ध ही इस ग्रन्थ में लिया गया है। उपनिषद एव प्रमाणं – उपनिषद वह प्रमाण हैं जो हमें जीवब्रह्मैक्यं का बोध कराता है।

प्रयोजनं तु - तदैक्यप्रमेयगताज्ञाननिवृत्तिः स्वस्वरूपानन्दावाप्तिश्च "तरति शोकम् आत्मवित् (छां उ ७।१।३) इत्यादिश्रुतेः "ब्रह्मविद् ब्रह्मैव भवति " (मुण्ड उ ३।२।९) इत्यादिश्रुतेश्च॥२९॥

अन्वयः – तत् ऐक्य प्रमेय गत अज्ञान निवृत्तिः स्व-स्वरूप-आनन्द-अवाप्तिः च “तरति शोकम् आत्मवित्” इत्यादि श्रुतेः “ब्रह्मविद् ब्रह्मैव भवति” इत्यादि श्रुतेः च।

अन्वयार्थः – (तत् ऐक्य प्रमेयगत) वह जो प्रमेय, जीव ब्रह्म ऐक्य, के विषय में (अज्ञान) अज्ञान है उसकी (निवृत्तिः) दूर होना तथा (स्व-स्वरूप) अपने स्वरूप के (आनन्द) आनन्द की (अवाप्तिः) प्राप्ति “(तरति) पार हो जाता है (शोकम्) शोकों से (आत्मवित्) आत्मज्ञानी” (इत्यादि श्रुतेः) इस श्रुति में निर्दिष्ट है और “(ब्रह्मविद्) ब्रह्मवेत्ता (ब्रह्मैव) ब्रह्म ही (भवति) हो जाता है” (इत्यादि श्रुतेः च) इत्यादि श्रुति से भी निर्दिष्ट है।

The necessity is the dispelling of ignorance relating to that identity which is to be realised, as the attainment of bliss resulting from the realisation of one’s own Self. As in such Sruti passages, “The knower of Self overcomes grief” (Ch. Up. VII-1.3), “He who knows Brahman becomes Brahman” (Mund. Up. III-2-9).

प्रयोजन का अर्थ होता है लाभ या फल। इससे क्या मिलेगा? क्या फायदा होगा?  तत्काल लाभ तो यह होगा कि प्रमा/विद्या/ज्ञान प्राप्त होगा क्योंकि जब प्रमाता-प्रमाण-प्रमेय साथ होते हैं तो प्रमा उत्पन्न होती है। इस प्रमा या ब्रह्मविद्या के परिणामस्वरूप लाभ क्या होगा? ज्ञान, अज्ञान को निवृत्ति करना है नाश करता है। अज्ञान निवृत्ति का परिणाम होता है कि अज्ञान का जो कार्य (शोकमय संसार) है उसकी निवृत्ति हो जाती है। 
अब लाभ-रूप होता है आनन्द प्राप्ति। परन्तु यदि आनन्द आयेगा तो वह चला भी जायेगा अतः कहा है स्व-स्वरूप-आनन्द प्राप्तिः – जो स्वाभाविक आनन्द है – अतः यह कभी जायेगा नहीं क्योंकि स्वरूप का नाश होता नहीं है अतः इस आनन्द का कभी नाश नहीं होगा।
सुखमात्यन्तिकं यत्तद् बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम्। वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वतः – गीता ६-२१
यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः । यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते – गीता ६-२२

इस प्रकार अनुबन्ध चतुष्टय समाप्त हुआ। पिछली चर्चाओं में कई भाग और विभाग किये गये हैं इनसे सम्बन्धित शंका समाधान के लिये -


अनुबन्ध चतुष्टय
















अयमधिकारी जननमरणादिसंसारानलसन्तप्तो दीप्तशिरा जलराशिमिवोपहारपाणिः श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठं गुरुमुपसृत्य तमनुसरति "तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत् समित्पाणिः श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम् "(मुण्ड उ १।२।१२) इत्यादिश्रुतेः॥३०॥

अन्वयः - अयम् अधिकारी जनन-मरण-आदि-संसार-अनल-सन्तप्तः दीप्तशिरा जलराशिम्-इव-उपहार-पाणिः श्रोत्रियम् ब्रह्मनिष्ठम् गुरुम् उपसृत्य तम् अनुसरति | ‘तद् विज्ञानार्थं स गुरुम् एव अभिगच्छेत् समित्पाणिः श्रोत्रियं ब्रहनिष्ठम्’ इत्यादि श्रुतेः।

अन्वयार्थः – (अयम्) यह (अधिकारी) अधिकारी (जनन-मरण-आदि) जन्म मृत्यु आदि के रूप में (संसार-अनल) संसार अग्नि से (सन्तप्तः) सन्तप्त होकर (दीप्तशिरा जलराशिम् इव) जैसे वह व्यक्ति जिसके सिर में आग लगी हो वह सब काम छोड़कर सरोवर में कूदता है उसी प्रकार (उपहार-पाणिः) हाथ में उपकार लेकर (श्रोत्रियम्) श्रुतियों के ज्ञाता और (ब्रह्मनिष्ठम्) ब्रह्मात्मैक्य ज्ञान का अपरोक्ष अनुभव रखने वाले (गुरुम्) गुरु के (उपसृत्य) पास जाकर (तम्) उनका (अनुसरति) अनुसरण करता है | ‘(तद्) उसे, आत्मतत्त्व को (विज्ञानार्थं) जानने के लिये (स) उसे (गुरुम् एव) गुरु के ही पास (अभिगच्छेत्) जाना चाहिये (समित्पाणिः) हाथ में समिधा लेकर (श्रोत्रियं ब्रहनिष्ठम्) जो गुरु श्रोत्रिय और ब्रह्मनिष्ठ हों’  (इत्यादि श्रुतेः) इस प्रकार श्रुति में निर्दिष्ट है।

Such a qualified pupil scorched with the fire of an endless round of birth, death, etc., should repair – just as one with one’s head on fire rushes to a lake – with presents in hand, to a Guru, learned in the Vedas and ever living in Brahman, and serve him – as the following and other Srutis say: “Let him in order to understand this repair with fuel in his hand to a spiritual guide who is learned in the Vedas and lives entirely in Brahman” (Mund. Up. I-2-12).

अनुबन्ध चतुष्टय की व्याख्या समाप्त हो गई है । अधिकारी को अब विषय का ज्ञान होना चाहिये। यद्यपि अधिकार प्राप्त हो चुका है और वेद का विधिवत् अध्ययन किया है तथापि प्रमाता अपने आप ब्रह्मज्ञान का अन्वेषण नहीं कर सकता है – ‘शास्त्रज्ञोऽपि स्वान्तत्र्येण ब्रह्मज्ञानान्वेषणं न कुर्यात्’ – मुण्डकभाष्य १.२.१२। अतः उसे श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ गुरु के पास जाना चाहिये। वह विधि यहां बताया है कि किस प्रकार प्रमाता को गुरु के पास जाना चाहिये । तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया । 

स गुरुः परमकृपयाध्यारोपापवादन्यायेनैनमुपदिशति "तस्मै स विद्वानुपसन्नया सम्यक् प्रशान्तचित्ताय शमान्विताय । येनाक्षरं पुरुषं वेद सत्यं प्रोवाच तां तत्त्वतो ब्रह्मविद्याम्॥" (मुण्ड उ १।२।१३) इत्यादिश्रुतेः॥३१॥

अन्वयः – सः गुरुः परमकृपया अध्यारोप-अपवाद-न्यायेन एनम् उपदिशति। “तस्मै स विद्वान् उपसन्नाय सम्यक् प्रशान्त-चित्ताय शम-अन्विताय। येन अक्षरं पुरुषं वेद सत्यं प्रोवाच ताम् तत्वतः ब्रह्मविद्याम्॥“

अन्वयार्थः – (सः गुरुः) वे वेदज्ञ तथा ब्रह्मनिष्ठ गुरु (परमकृपया) अत्यन्त कृपा (अध्यारोप-अपवाद-न्यायेन) अध्यारोप-अपवाद की विधि से (एनम्) उसे (उपदिशति) उपदेश करते हैं। (सः) वह (विद्वान्) वेदज्ञ और ब्रह्मनिष्ठ गुरु (उपसन्नाय) शरणमें आये हुये; (सम्यक् प्रशान्त चित्ताय) पूर्णतया शान्तचित्तवाले; (शमान्विताय) शम दम आदि साधनयुक्त (तस्मै) उस शिष्य हो; (ताम् ब्रह्मविद्याम्) उस ब्रह्मविद्याका; (तत्त्वतः) तत्त्व विवेचन पूर्वक (प्रोवाच) भलिभांति उपदेश करे (येन) जिससे वह शिष्य (अक्षरम्) अविनाशी (सत्यम्) नित्य (पुरुषम्) परम पुरुषको (वेद) जान ले।

Such a Guru through his infinite grace instructs the pupil by the method of de-superimposition (Apavada) of the superimpositions (Adhyaropa) – as in such Sruti passages: “To that pupil who has approached him with due courtesy, whose mind has become perfectly calm, and who has control over his senses, the wise teacher should truly impart that Knowledge of Brahman through which he knows the Being, imperishable and real" (Mund. Up. I-2-13).

यदि इस प्रकार अधिकार प्राप्त किया हुआ प्रमाता गुरु के पास जाता है तो गुरु कोई मिथ्याहेतु (excuse) नहीं दे सकता है । वह गुरु को भी पढ़ाना पडेगा। अतः यहां तक यह बताया है कि गुरु और शिष्य अब पठन-पाठन आरम्भ करेंगे । प्रोवाच तां तत्त्वतो ब्रह्मविद्याम्। पढ़ाने कि विधि भी यहां बताई है – अध्यारोप अपवाद न्याय के द्वारा।

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
हरिः ॐ

Note:
The English commentary/translation is by Swami Nikhilanand (published by Advaita Ashrama).

2 comments:

Anonymous said...

Aum.

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Thanks a lot.

Indiaspirituality Amrut said...

Hari OM
Thank you for your Kind Words
prāṇām-s

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