Sunday, March 13, 2016

Vedanta Saara - Sadanand Yogindra Saraswati - Part 1

नारायणं पद्मभुवं वसिष्ठं शक्तिंच तत्पुत्र पराशरं च । व्यासं शुकं गौडपदं महान्तं गोविन्दयोगीन्द्रमथास्य शिष्यम् ॥

श्री शंकराचार्यमथास्य पद्मपादं च हस्तामलकं च शिष्यम् । तं त्रोटकं वार्त्तिककारम् अन्यान् अस्मद् गुरून् सन्ततम् आनतोऽस्मि ॥

श्रुतिस्मृति पुराणानाम् आलयं करुणालयं। नमामि भगवत्पादं शंकरं लोकशंकरम्॥

शंकरं शंकराचार्यं केशवं बादरायणम्। सूत्रभाष्य कृतौ वन्दे भगवन्तौ पुनः पुनः॥

ईश्वरो गुरुरात्मेति मूर्तिभेदविभागिने। व्योमवद् व्याप्तदेहाय दक्षिणामूर्तये नमः॥



Vedanta saara is a prakarana book for Advaita Vedanta written by Swami Sadanand Yogindra Saraswati. A book that explain the terms and terminologies used in shastra books is called `Prakarna’ book.It starts with a mangalacharana which is as follows:

मङ्गलाचरण


अखण्डं सच्चिदानन्दमवाङ्मनसगोचरम् । आत्मानमखिलाधारमाश्रयेऽभीष्टसिद्धये॥१॥
अन्वयः – (अहम्) अभीष्ट सिद्धये, अखिलाधारम् अवाङ्गमनसगोचरम् अखण्डम् सच्चिदानन्दम् आत्मानम् आश्रये।

I take refuge in the Self, the Indivisible, the Existence-Consciousness-Bliss Absolute, beyond the reach of words and thought, and the substratum of all, for the attainment of my cherished desire.

(अहम्) (अभीष्ट) ग्रन्थ के निर्विघ्न पूर्ति, दुःखों की आत्यन्तिक निवृत्ति, और परमानन्द प्राप्ति रूपी अपने अभीष्ट कार्य की (सिद्धये) सिद्धि हेतु, (अखिलाधारम्) सम्पूर्ण स्थावर जङ्गम प्रपञ्च के आधार (अवाङ्गमनसगोचरम्) वाणी मन आदि समस्त इन्द्रियों से अतीत, (अखण्डम्) अनन्त, (सच्चिदानन्दम्) स्वप्रकाश चैतन्य आनन्दस्वरूप (आत्मानम्) आत्मा का (आश्रये) आश्रय लेता हूं।


    अर्थतोऽप्यद्वयानन्दानतीतद्वैतभानतः । गुरूनाराध्य वेदान्तसारं वक्ष्ये यथामति॥२॥
अन्वयः - अतीत-द्वैतभानतः अर्थतः अपि अद्वयानन्दान् गुरून् आराध्य यथामति वेदान्त-सारं वक्ष्ये ।

Having worshipped the Guru who on account of his being free from the illusion of duality justifies the meaning of his name Advayananda, I undertake the task of expounding the essence of the Vedanta according to my light.

(अतीत-द्वैतभानतः) जिनका द्वैत का भान समाप्त हो गया है और जो (अर्थतः) अर्थतः (अपि) भी (अद्वयानन्दान्) अद्वयानन्द हैं ऐसे (गुरून्) गुरुदेव की (आराध्य) वन्दना करके (यथामति) अपनी बुद्धि के अनुसार (वेदान्त-सारं) वेदान्तसार नामक ग्रन्थ की (वक्ष्ये) रचना करता हूं।

गुरुदेव नाम से भी अद्वयानन्द हैं और द्वैतबोध के परे जा चुके होने के कारण अपने नाम को सार्थक भी करते हैं, उन गुरु की वन्दना करके यह ग्रन्थ कहता हूं।
पुस्तक का नाम ‘वेदान्त-सार’ है अतः पहले ‘वेदान्त’ शब्द को परिभाषित करते हुये कहते हैं-

Subject Matter of Vedanta/विषय प्रवेश


वेदान्तो नामोपनिषत्प्रमाणं तदुपकारीणि शारीरकसूत्रादीनि च ।३।

अन्वयः – वेदान्तः नाम उपनिषत् प्रमाणम् तत् उपकारिणी शारीरक-सूत्रादीनि च।

Vedanta is the evidence of the Upanishads, as well as the Sariraka Sutras (Brahma Sutras) and other books that help in the correct expounding of its meaning.

(उपनिषत् प्रमाणम्) उपनिषद प्रमाण का नाम ही वेदान्त है। (शारीरक-सूत्रादीनि) शारीरकसूत्र आदि अन्य ग्रन्थ (तत्) उसके (उपकारी) सहायक हैं।

वेदों के अन्तिम निर्णय या शिक्षा को उपनिषद कहते हैं। इसको ब्रह्मविद्या अथवा ब्रह्मज्ञान भी कहते हैं। ‘प्रमाण’ उस साधन को कहते हैं जो कि ज्ञान (प्रमा) प्राप्ति में सहायक होता है। अतः ‘उपनिषत् प्रमाणम्’ का अर्थ हुआ - वह साधन जो कि ब्रह्मविद्या की प्राप्ति में सहायक हो। वेदव्यास द्वारा रचित ब्रह्म सूत्र को ही शारीरक सूत्र भी कहते हैं। ‘शारीरक’ का अर्थ हुआ - संसारी जीवात्मा। जो सूत्र संसारी जीवात्मा के विषय में बात करते हैं और इसका ब्रह्म से एक्यं दिखाते हैं उनकों ब्रह्म सूत्र कहते हैं।
जब ‘वेदान्त-सार’ कहते हैं तो उसमें प्रयोग हुआ ‘वेदान्त’ शब्द से निम्नलिखित वस्तुयें परिलक्षित हैं –
  • १०८ उपनिषद ग्रन्थ
  • इन उपनिषद ग्रन्थों के तत्त्व को समझने के लिये जो अन्य ग्रन्थ सहायक हैं जैसे ब्रह्मसूत्र, उपनिषद के भाष्य और भगवद्गीता आदि ।

अस्य वेदान्तप्रकरणत्वात् तदीयैः एव अनुबन्धैः तद्वत्तासिद्धेः न ते पृथगालोचनीयाः ।४।


अन्वयः – अस्य वेदान्त प्रकरणत्वात् तदीयैः एव अनुबन्धैः तद्वत्ता-सिद्धेः न ते पृथक-आलोचनीयाः।

On account of its being a Prakarana treatise of Vedanta, the Anubandhas, preliminary questions of the latter, serve its purpose as well. Therefore they need not be discussed separately.

(अस्य) प्रस्तुत ग्रन्थ के (वेदान्त प्रकरणत्वात्) वेदान्त के प्रकरण ग्रन्थ होने के कारण (तदीयैः) उसके (एव) ही (अनुबन्धैः) अनुबन्ध (तद्वत्ता-सिद्धेः) इस ग्रन्थ के भी होंगे, अतः (ते) उन अनुबन्धों को (न) नहीं (पृथक-आलोचनीयाः) अलग बताने की आवश्यकता है।

ग्रन्थ रचना से पूर्व स्वभावतः चार प्रश्न उपस्थित होते हैं –
  • इसको कौन पढ़ सकता है अर्थ इसको पढ़ने का कौन अधिकारी है। 
  •  इसमें कौन सा विषय लिखा है। 
  •  इसमें लिखे हुये विषय तथा पुस्तक में क्या सम्बन्ध है। 
  •  इस पुस्तक के पढ़ने से मुझे क्या लाभ होगा। इस पुस्तक का क्या प्रयोजन है।
इन चारों (अधिकारी, विषय, सम्बन्ध, प्रयोजन) को अनुबन्ध चतुष्टय कहते हैं। मुख्य वेदान्त ग्रन्थों में आचार्यों नें इन चारों का बार बार विचार किया है। प्रस्तुत ग्रन्थ भी उसी विषय का ग्रन्थ होने के कारण इसके लिये भी वही अनुबन्ध चतुष्टय स्वीकार्य हैं।

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
हरिः ॐ

Note:
The English commentary/translation is by Swami Nikhilanand (published by Advaita Ashrama).

2 comments:

Indiaspirituality Amrut said...

Namaste,

This is an excellent effort Gaurav. anvaya and Hindi translation are much helpful.

Anonymous said...

Splendid effort!. Very authentic and beautifully done.

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